रमज़ान : सबके लिए दुआ और हिफाज़त

 


-डा.नाज़ परवीन-


 


कोरोना के मुश्किल दौर में रमजान-ए-मुबारक का महीना आने वाला है। रमज़ान इस्लाम में सबसे पाक महीना माना जाता है। इस्लामी कैलेण्डर का यह नौवां माह है। कहते है, इस माह की बरकत से खुदा अपने बन्दों की दुआऐं सुनता है। रमज़ान की रूहानी चमक अपने बन्दे को हर बुराई से दूर रखकर अल्लाह के नज़दीक आने का मौका देती है। हर दिन लाखों हाथ सबके लिए दुआ करते हैं। इस्लाम की पांच बुनियादों में रोजा भी शामिल है। आज दुनिया भर के लोगों में डर और खौफ अपना कहर बरपा रहा है, दुनिया डरी हुई है मौत का पर्याय बन चुके कोविड-19 की महामारी से, ऐसे में रमज़ान का महीना खुदा को राज़ी करने के विशेष मौके के रूप में देखा जाना चाहिए। इस्लाम धर्म के अनुसार रमज़ान आत्मनियंत्रण और खुद पर संयम रखने का महीना है। रोजे के दौरान भूख-प्यास दुनिया के गरीब लोगों की भूख और दर्द को समझ पाने का बेहतरीन तरीका है। भारतीय संस्कृति अनेकता में एकता का संदेश देने वाली रही है। हमारी परम्पराऐं दुआओं और प्रार्थनाओं का संगम है। सदियों से भारत एक ऐसा फूलों का गुलदस्ता रहा है, जिसमें भिन्न-भिन्न रंग के फूल इसकी खूबसूरती को चार चांद लगाते आये हैं। इस गुलदस्ते के फूल हर तीज-त्योहारों में बराबर खुश्बू बिखेरते हैं, यही विरासत हमारे पूर्वजों ने हममें हस्तांतरित की अब हमारी बारी है। सभ्यता और संस्कृति की अपनी प्राचीन विरासत को सहेजने की। रमज़ान मन का बैर, गिले-शिकवे, लडाई-झगड़े से दूर रहकर समाज में एकता और भाईचारा कायम करने का संदेश देता है। रमज़ान का महीना गरीबों की मदद करने, उनके खाने-कपड़े के इंतेजाम की हिदायत देता है। ताकि कोई भूखा न सोए। आज जब दुनिया के देश भूख से परेशान लोगों की खस्ता हाल तस्वीर से परेशान है, ऐसे में हम सबको बढ़-चढ़कर लोगों की जरूरतों का सामान मुहैया कराने में मदद करनी चाहिए क्योंकि ऐसी मान्यता है कि अल्लाह अपने बन्दों को इस महीने की बरकत से एक नेकी के बदले सत्तर नेकी का पुण्य देता है। रमज़ान बरकत का महीना है। हर भारतीय की प्राथमिकता अपने देश के प्रति इस महामारी से निकलने में अपने दायित्वों का निर्वाहन करने की है, जब देश खुशहाल होगा तभी रब राज़ी होगा और जब रब राज़ी होगा तभी मगफिरत का रास्ता साफ होगा। रमज़ान दोस्ती का महीना है, यह सबके लिए दुआ और हिफाज़त का पैगाम है।


रमज़ान में रोज़ा अल्लाह की राह पर बन्दों का समर्पण है, जिसमें सारा दिन भूख-प्यास के साथ शारीरिक एवं मानसिक इच्छाओं पर नियंत्रण है ताकि बुरा बोलने, सुनने और देखने से बचा जा सके। यह विचारों पर संयम रखने की ताकीद देता है। रमज़ान आत्मा की पवित्रता पर जोर देता है। रमज़ान के 30 रोज़ो को तीन भागो में बांटा जाता है। पहला अशरा 10 दिन ‘रहमत‘ का, दूसरा अशरा 10 दिन ‘बरकत का, तीसरा अशरा 10 दिन ‘मगफिरत‘ का, जिसमें खुदा अपने बन्दों के गुनाह माफ करता है। कोरोना महामारी के चलते दुनिया के प्रार्थना स्थल बन्द हैं, लोग घरों से प्रार्थनाऐं, दुआऐं कर रहे हैं। इस सदी के समाज ने पहले कभी ऐसी मुश्किल का सामना नहीं किया, इसलिए परेशान होना स्वभाविक है। इतिहास गवाह है, हर सदी में कोई न कोई कोरोना जैसी ला-इलाज महामारी आती है, जब दुनिया के अविश्कार ठप्प हो जाते हैं, साइंस की दुनिया दैवीय चमत्कार का इन्तेजार करती नज़र आती है। दुनिया भर के लोग इस महामारी से मानव जीवन की सुरक्शा के लिए दुआ और प्रार्थना कर रहे हैं। भारत ने इस बीमारी का तोड सामाजिक दूरी, स्वच्छता, करूणा और सेवाभाव से निकालने का प्रयास किया है, जो काफी हद तक सफलता की दिशा मे अग्रसर है। कोरोना के चलते रमज़ान कैसे मनाये? नमाज कैसे पढे? सामाजिक दूरी का ध्यान कैसे रखे? यह गंभीर चिंतन और मंथन का विशय है कि कैसे हम सबकी हिफ़ाजत का ध्यान रखते हुए अपनी इबादत पूरी कायनात की खैरियत और तरक्की के लिए करें।


इस्लाम के पैगम्बर हज़रत मोहम्मद साहब ने इन प्रश्नों का हल बहुत पहले ही दे दिया था। आज भी उनके कथन को कई हदीसों में पढा जा सकता है। कोरोना वायरस का इलाज अब तक दुनिया के वैज्ञानिक खोज नहीं पाए हैं, ऐसे में सोशल डिस्टेंसिंग ही इसका कारगर इलाज है। हज़रत मोहम्मद साहब ने कहा है, कि ‘जिस किसी को भी संक्रमक रोग है, उसे सेहदमंद लोगों से दूर रहने की हिदायत है।‘ ‘शाही, अलबुखारी, 6771 एवं अल मुस्लिम 2221‘ भारत जैसे विस्तृत देश में सामाजिक दूरी एक बेहतर उपचार है, जिसका फायदा हमारी मेडिकल टीम समय-समय में अपडेट देकर कर रही है। पहले कोरोना के मामले तीन दिन में दोगुना हो जाते थे। अब यह लगभग सात दिन का समय ले रहे हैं। ऐसे में एक सकारात्मक उम्मीद लगाई जा सकती है कि जल्द ही इस कूर महामारी से निज़ात मिल जाएगी। ऐसे में हर भारतीय की जिम्मेदारी है कि वह अपने परिवार, समाज एवं राश्टृ हित के लिए सामाजिक दूरी बनाये रखने का दायित्व पूरा करे। रमज़ान इबादत का महीना है, इसलिए हज़रत मोहम्मद साहब ने फरमाया है कि महामारी के वक्त आपका घर ही मस्जिद है।जो सवाब मस्जिद में नमाज पढने का है, ऐसे समय में वही सवाब घर में पढ़ी हुई नमाज़ का है। ‘अल तिर्मिजी अल-सलाह 291‘ हज़रत मोहम्मद साहब का जीवन बुराई को अच्छाई से जीतने वाला है। उनके जीवन के अनगिनत किस्से दुनिया को शांति और सब्र का संदेश देते हैं। उन्होंने साफ़-सफाई और स्वच्छता को आधा ईमान के साथ रहना बतलाया है, वो कहते थे कि लोगों को अपने घर आते ही अपने हाथ धो लेना चाहिए। ‘अल मुस्लिम 223‘ जब हज़रत मोहम्मद साहब को छींक या खांसी आती थी, तब वह खुद कपडे से अपने मुंह को ढ़क लिया करते थे। ‘अबु दाउद, अल तिर्मिजी, बु43, हदीश 2969, शाही‘ दुनिया के लोग अपने इतिहास से सीख लेते हुए इस महामारी से बाहर निकलने में कामयाब होंगे। विश्व के सभी धर्मो में मत-मतान्तर होने पर भी शांति और मानव कल्याण की भावना पर सभी एकमत हैं। मानव जाति के अस्तित्व पर खतरा बने इस वायरस से जीतने के लिए हर भारतीय को एकजुटता दिखानी होगी। तभी मानवता की जीत होगी। मानव जाति पर डर और खौफ का कहर बरपा रहे, कोविड-19महामारी से मिलकर लडने के प्रयासों को रमज़ान के महीने में खुदा को राजी करने के प्रयासों में ही देखा जाना चाहिए। भूखे, जरूरत मंदों की मदद, सामाजिक दूरी का ध्यान रखने का प्रयास, हर भारतीय को करना चाहिए, ताकि इस महामारी से निज़ात हासिल हो सके, क्योंकि रमज़ान सबके लिए दुआ और हिफ़ाज़त का पैग़ाम है।