प्रवासी मजदूरों की कौन सुनेगा

 


-सुखदेव सिंह-


 


अगर समय रहते प्रवासी मजदूरों को सभी मूलभूत सुविधाओं से लैस किया होता तो आज आपदा की इस घड़ी में इतनी मगजमारी नहीं करनी पड़ती। बेशक मजदूर दिवस हर वर्ष मनाया जाता है मगर जिस तरह आज प्रवासी मजदूरों का पलायन उनके अपने राज्यों में किया जा रहा है यह कहीं न कहीं हमारी व्यवस्था की भी पोल खोल रहा है। कोरोना वायरस की वजह से लोग आज घरों में बैठने को मजबूर हो चले हैं। सरकार की तरफ  से लोगों को हर तरह की सुविधा मुहैया करवाए जाने को लेकर जद्दोजहद की जा रही है। मगर सबसे ज्यादा आज प्रवासी मजदूर सकते में हैं जिनकी रोजी-रोटी का जरिया बंद हो जाने से उनके पेट की भूख कैसे मिटे यह सबसे बड़ा सवाल है। बदलते सामाजिक परिवेश के चलते जेलों में बंद सजायाफ्ता मुजरिमों को भी अब आधुनिक युग की सभी सुविधाएं मिल रही हैं।


पशुओं तक को कोई आंच न आए, पशुपालक उनका पूरा ख्याल रखते हैं। मगर कुछेक उद्योग प्रबंधकों की ओर से खासकर प्रवासी मजदूरों को जो सुविधाएं दी जा रही हैं उससे मानवता भी शर्मसार होकर रह जाती है। प्रवासी मजदूर पेट की आग बुझाने की खातिर पशुओं से भी बद्दतर जीवन जीने को मजबूर हैं। प्रवासी मजदूरों को ज्यादातर अस्थायी कच्ची झोंपडि़यों में ठहराकर लेबर एक्ट की धज्जियां उड़ाई जाती हैं। झोंपडि़यां इस कद्र तंग और छोटी होती है कि एक मजदूर सीधे खड़े भी नहीं हो सकता है। कहने को तो यह आवास स्थान है, लेकिन उनमें रहने वाले मजदूरों को यह काले पानी की सजा से कम नहीं हो सकती है। ऐसे अस्थआइ आवास स्थानों में खिड़कियों का कोई नामोंनिशान तक नहीं होता है।


लकड़ी की पतली तख्तियों का दरवाजा बनाकर झुग्गियों के अंदर पडे़ सामान की सुरक्षा की जाती है। ऐसी झुग्गियों की छत पर घास-फूस और लोहे की पतली चादरें डाली होती हैं। प्रवासी मजदूर अकसर ठंड और बारिश के मौसम में झुग्गियों के अंदर ही भोजन पकाते हैं। गर्मी के मौसम में झुग्गियों की छत पर डाली गई लोहे की चादरें इस कद्र तपिश देने से ऐसे मजदूर मानो झुलसकर रह जाते हैं। यही वजह है कि अकसर आगजनी की घटनाएं घटित होकर उन्हें ही जान-माल का नुकसान उठाना पड़ता है। झुग्गियों में स्थायी रूप से बिजली, शौचालय और पानी का अभाव रहने के कारण भी ऐसे प्रवासी लोगों को दिक्कतें झेलनी पड़ती हैं।


भारी बारिश होने की सूरत में बेकार बैठकर मजदूरों को झुग्गियों में दुबककर मौसम खुलने का इंतजार करना पड़ता है। ऐसे लाचार मजदूरों के लिए कब सूरज चढ़ा और डूब गया, उन्हें पता नहीं चलता है। दुखद बात यह कि करीब पंद्रह घंटे कड़ी मशक्कत करने वाले प्रवासी मजदूरों को अपना तन मांगे हुए कपड़ों से ढकने के लिए मजबूर होना पड़ता है। कहने को बाल मजदूरी अपराध माना गया है। मगर प्रवासी मजदूरों के बच्चे अकसर अपने परिवार वालों का हाथ काम में बराबर बंटाते हैं। ठीक ऐसा ही सूरत-ए-हाल कुछेक ईंट-भट्ठों और अन्य उद्योगों में मजदूरी करने वाले प्रवासी मजदूरों का है। उद्योग मालिकों की ओर से स्थायी आवास न दिए जाने की वजह से बिजली की सुविधा भी मजदूरों को स्थायी रूप से मिलने का सवाल ही पैदा नहीं होता है।


उद्योग प्रबंधक विद्युत विभाग के कर्मचारियों की आपसी सांठ-गांठ की वजह से मजदूरों को बिजली मुहैया करवाने की कोशिश करते हैं। एक बिजली मीटर पर कितने बल्ब जगाए जा सकते हैं, विद्युत विभाग के कर्मचारी ही सही बता सकते हैं। बात अगर सैकड़ों मजदूरों को झुग्गियों में अस्थायी रूप से बिजली उपलब्ध करवाने में किस तरह के मापदंड बनाए जाते होंगे। एक तरफ  पूरे भारत में स्वच्छता अभियान को चलाए हुए है, वहीं प्रवासी मजदूरों के अस्थायी आवासों में शौचालय की व्यवस्था न होने के कारण उन्हें खुले में ही शौच करना पड़ता है।


आखिर क्या वजह कि सभी सरकारें ऐसे उद्योगपतियों के समक्ष कमजोर नजर आ रही हैं। मज़दूरों के बलबूते अपनी तिजोरियां भरने वाले उद्योगपति क्यों मजदूरों को सही सुविधाएं दिए जाने में नाकाम चल रहे हैं। प्रवासी मजदूरों को पूरा दिन मिट्टी के साथ मिट्टी होना पड़ता है, तब जाकर उन्हें चंद सिक्के नसीब हो पाते हैं। आखिर कितने प्रवासी मजदूर सीजन खत्म होने पर मालामाल होकर वापस अपने राज्यों को जाते हैं, उद्योग विभाग और श्रम मंत्रालय को इस बारे जानना होगा। उद्योग मालिकों की ओर से सही कच्ची ईंटों के दाम भी नहीं दिए जाते हैं। ऐसे उद्योग मालिक कच्ची ईंट मजदूरों से सैकड़ों रुपए में खरीदकर बाद में उसे पकाकर छह हजार रुपए तक बेचकर चांदी कूट रहे हैं।


अकसर ऐसे मजदूर उद्योग मालिकों की ज्यादतियों के शिकार रहते हैं मगर उनकी पीड़ा समझने वाला कोई आगे नहीं आता है। आपातकालीन परिस्थितियों में भी ऐसे मजदूरों को सिवाय निराशा के कुछ हाथ नहीं लगता है। तंग झुग्गियों में रहकर जीवन यापन करने वाले मजदूर क्षय रोग के शिकार रहते हैं। सरकारों की स्वास्थ्य सुविधाएं भी ऐसे लाचार मजदूरों को सही नहीं मिल पाती हैं। सर्दी, गर्मी और चाहे हो बरसात, पर्याप्त बिस्तर अभाव में सदैव जमीन पर सोना मानो ऐसे मजदूरों का मुकद्दर बन चुका है। मजदूर दिवस हर साल मनाया जाता है मगर इसके बावजूद मजदूरों की दुर्दशा में फिलहाल कोई सही सुधार न हो पाना दुर्भाग्यपूर्ण है।


अपना प्रदेश एक शांतिप्रिय  होने की वजह से उत्तर प्रदेश, बिहार, जम्मू-कश्मीर और ओडिशा आदि राज्यों के लोग यहां मेहनत-मजदूरी करने चले आते हैं। उद्योग मालिक  प्रवासी मजूदरों और अपने राज्यों के कर्मचारियों को सही वेतनमान एवं अन्य सुविधाएं सही नहीं दे पा रहे हैं। प्रवासी मजदूर अधिक फिजूलखर्ची की वजह से उद्योग मालिकों के कर्जदार बनकर रह जाते हैं। कर्जा न चुका पाने की सूरत में मजदूरों को कभी कभार सीजन खत्म होने के बावजूद वापस अपने घरों को लौटना मुश्किल हो जाता है।


 


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