शिक्षा भारत की ज़रूरत हैं तथा जनता का संवैधानिक अधिकार: प्रमेन्द्र भाटी ऐडवोकेट



 शिक्षा का अधिकार
समान नागरिक शिक्षा संहिता (शिक्षा का एकीकरण)व धनमुक्त (शुल्कमुक्त)शिक्षा भारत की ज़रूरत हैं तथा जनता का संवैधानिक अधिकार और देश की तरक़्क़ी का हाईवे हैं अभाव व ग़रीबी में दम तोड़ती प्रतिभाओं का संरक्षण व संवर्धन देश का भविष्य सँवार देगा अच्छे शिक्षा केन्द्र और शिक्षा के नाम पर हो रहा व्यवसाय और उनसे प्राप्त शिक्षा धनकुबेरो  के घर गिरवी न रह पायेगी निम्न व उच्च मध्यम वर्ग की 60% 80% कमाई का हिस्सा अच्छी शिक्षा दिलाने के नाम पर ख़र्च करना पड़ रहा हैं आय का शेष बचा हिस्सा दाल रोटी में ख़र्च हो जाता हैं और फिर यही से भ्रष्टाचार का जन्म होता है कई बार उच्च शिक्षा दिलाने हेतु क़र्ज़ भी लेना पड़ता हैं और आर्थिक रूप से कमज़ोर के लिए तो अच्छी शिक्षा एक स्वप्न बनकर रह जाती हैं और ग़रीब के घर जन्मे ज़्यादातर प्रतिभावान बच्चों की प्रतिभा तो जन्मकुंडली के साथ ही दम तोड़ जाती हैं जबकि 
 प्रतिभा किसके घर जन्म ले ले इसका किसी को भान नहीं होता वह तो ग़रीब माँ की कोख से भी जन्म ले सकती हैं और लेती भी हैं इतिहास ऐसी प्रतिभाओं का साक्षी हैं अभी जल्दी कुछ वर्ष पहले डॉ आनन्द जी ने बिहार में स्वयं और सुपर 30 द्वारा ग़रीब और अभाव ग्रस्त प्रतिभाओं को देश और दुनिया के नक़्शे पर उकेर कर स्थापित कर सिद्ध किया हैं और अभी भी देश के भिन्न भिन्न कोने में और बहुत लोग अपनी योग्यता व सामर्थ्य से इस कार्य में जुनूनी तौर पर कार्यशील हैं 
- [ ] अच्छी शिक्षा दिलाने हेतु अपने पारिवारिक व सामाजिक रिश्तो को छोड़कर अपनी जन्म भूमि से दूर शहर की तरफ़ पलायन करना पड़ता हैं यानि व्यक्ति अपने सामाजिक व पारिवारिक मूल पृष्ठभूमि से दूर एक ऐसी दुनिया का हिस्सा बनकर जीना सिखता हैं जहाँ उसके लिए सब अनजान और पराए होते हैं बचपन की यादें चाचा चाची ताऊ ताई दादा दादी का प्यार और भरा पूरा परिवार गाँव समाज और उस मिट्टी की ख़ुशबू तथा पड़ोसियों का स्नेह रह रहकर याद आता हैं बड़ों का वो प्यार भरा दिल की गहराई से मिलने वाला निस्वार्थ आशीर्वाद खेत खलियान सबसे दूर बस एक ही उद्देश्य कि यहाँ मेरा अपना घर बन जाए और मेरे बच्चें अच्छी शिक्षा प्राप्त कर कामयाब हो जाए और न केवल मेरा नाम बढ़ायें बल्कि मेरे बुढ़ापे का सहारा भी बने किंतु  नव शिक्षित पीढ़ी की लिए आपका त्याग एक साधारण कार्य होता हैं कुछ माँ बाप के अरमानो को सँवारते भी हैं और कुछ कामयाब होकर माँ बाप से इतनी दूर चले जाते हैं कि मॉ बाप को अपने निर्णय पर पछतावा होने लगता हैं और अवसाद से ग्रसित हो जाते हैं  कुछ माँ बाप को तो मजबूरी में वृद्धाश्रम में ही जीवन का शेष हिस्सा गुज़ारना पड़ता हैं जीवन के सारे सपने बिखर कर चूर चूर हो जाते हैं देखने में आया हैं की शहरों में यह समस्या गम्भीर रूप धारण करती जा रही हैं जबकि गाँव व ग़रीबों में बहुत कम हैं और यह सब धन केन्द्रित असमान ग़ैर संस्कारित शिक्षा तथा समाज तथा अपनी मूल जड़ो से दूर जाने का ही प्रतिफल हैं शिक्षा का वर्तमान ढाँचा देश व समाज हित में क़तई भी नहीं हैं यदि प्रतिभाओं का संरक्षण और संवर्धन हो गया तो देश से प्रतिभाओं का बड़े स्तर पर पलायन भी नहीं होगा ये प्रतिभाएँ देश को दुनिया में प्रत्येक क्षेत्र में सिरमौर बना देंगी
शिक्षा का निजीकरण व असमान शिक्षा पद्दति देश को दीमक की तरह खोखला कर रहा हैं अब शिक्षा व्यवसाय बनकर उद्योग का दर्जा ले चुकी हैं और लगभग सभी बड़े उधोगपति इस क्षेत्र अपने पाँव गड़ा चुके हैं इसी का नतीजा हैं कि शिक्षण संस्थान कोरोंना जैसी भयानक महामारी के समय शासन व प्रशासन द्वारा कड़े आदेश व निर्देशो को भी धता बताकर न मानने पर उतारू हैं अभिभावको द्वारा सोशल साइट पर बड़े स्तर पर शुल्क न वसूलने के सम्बंध में चलायी गयी मुहिम का भी इन पर कोई प्रभाव इनके प्रभाव के सामने प्रभावहीन होकर दम तोड़ गया 
भूतकाल में कोई कल्पना भी नहीं कर सकता था कि ऋषियों मुनियो के देश में जहाँ शिक्षा सबसे बड़ा दान माना गया हैं और गुरु को भगवान से बड़ा दर्जा प्राप्त हो तथा गुरु की महिमा इतनी विराट हैं कि गुरु गोविंद दाऊ खड़े काके लागू पाँय बलिहारी गुरु आपने गोविंद दियों बताय का अनुसरण किया गया हो  गुरु वहाँ गुरु न रहकर शिक्षक बन गया वर्तमान में शिक्षको को धन लोलुप उद्योगपतियो की कठपुतली बना दिया तथा उधोगपतियो ने शिक्षक का आदर व सम्मान व स्वाभिमान अपने पास गिरवी रख लिया जिससे शिक्षक का समर्पण शिक्षा व शिष्यों के प्रति न होकर धन कुबेरो के लिए केन्द्रित हो गया फलस्वरूप अभिभावक संघो का जन्म हुआ वर्तमान शिक्षा पद्दति को सरकार निजीकरण से मुक्त कर समस्त शिक्षण संस्थानों का राष्ट्रीयकरण करके शिक्षा का एकीकरण अर्थात समस्त भारत में एक समान शिक्षा एक समान योग्य शिक्षकों द्वारा शिक्षित करने की नीति लागू हो जाय हालाँकि बाज़ारीकरण के दौर में तोड़ा मुश्किल भरा क़दम हैं किन्तु देश की अस्मिता और उसके सर्वांगी विकास के लिए आवश्यक हैं ऐसा नहीं हैं कि भारत में इस हेतु कही प्रयास ही नहीं हुए हो विगत समय में माननीय उच्च न्यायालय इलाहाबाद के माननीय न्यायमूर्ति श्री सुधीर अग्रवाल जी द्वारा समान शिक्षा पद्दति की दिशा में आदेश भी पारित किया था जिसकी माननीय सुप्रीम कोर्ट में अपील होने पर वह तारीख़ों के सागर में डूबकी लगा रहा हैं यदि केंद्र सरकार शिक्षा के प्रति पूर्ण जागरूक होकर दृढ़ इच्छा शक्ति से देश में समान शिक्षा की गंगा को अविरल बहने का निर्णय ले ले तो देश ज्ञान का सागर बन जाएगा तथा सही मायने में देश में शिक्षा के संवैधानिक अधिकार की प्राप्ति होगी।
                       


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